सपने लहरों जैसे होते हैं
किनारे ढूँढ़ते रहते है
किनारे ढूँढ़ते रहते है
लिखना इतना आसान नहीं होता भावों की शाब्दिक अभिव्यक्ति सरल नहीं होती, भाषा के सागर से शब्दों के मोती चुनना, भावों में ढाल कर सोच को पृष्ठों पे उतरना मुझे बड़ा ही कठिन लगता है पिछले १५ -१६ वर्षो से मन के किसी कोने में लिखने का शौक था !शायद तभी एक फांस सी चुभती थी की इतना पढ़ती हूँ पर लिख नहीं पाती ,पिताजी कहते थे लिख तभी तो पता लगेगा क्या सीखा , भाषा में स्पष्टता आएगी फिर भी कभी कुछ नहीं लिखा मैंने तब मैं जब भी लिखने की सूचती लगता की समय बर्बाद कर रही हूँ इतनी देर में कुछ और न पढ़ लूँ और पढने का शौक लिखने पे हावी हो जाता पढने का ये शौक विरासत में मिला है, दादा जी को भी मैंने हमेशा कुछ न कुछ पढ़ते हुए ही देखा बचपन में चम्पक, नंदन, बालहंस, नन्हे सम्राट से टीन एजर और फिर कब टैगोर,शिवानी,मृणाल पाण्डे,हिमांशु जोशीजी,ओ हेनरी, हेमिंग्वे , प्रेमचंद, शैलेश मटियानी,कमलेश्वर को पढने लगी पता ही नहीं चला घर में पापा, चाचा सभी साहित्य के प्रशंषक हैं किताबों की कभी कोई कमी नहीं थी श्रृंखला के प्रकाशन ने एक नई सोच और मधु चाचा ने कवि सम्मेलनों में ले जाकर मुझे नया जीवन दे दिया , अब मैं कुमाउनी साहित्य से भी जुड़ गई थी बालम सिंह जानोटी जी और देवकी दादी की रचनाए मुझे बहुत अच्छी लगती फिर पढ़ाई बीच में आ गई जब किताबों की कमी लगी तो अल्मोड़ा की लिब्ररी की मेम्बरशिप ले ली पिताजी ने ....लगभग पिछले 15 साल से मेम्बर हूँ Pgdca के समय तक तो साहित्य पढ़ती रही लेकिन Mba में घर से दूर आकर किताबों के आभाव में पढना बंद हो गया, अब स्लेबस की किताबें ही थी पढने को, अब जब Mba पूरा हो गया है फिर से पढ़ना शुरू करुँगी और सोच लिया है कुछ अच्छा लिखूंगी......इसलिए ये ब्लॉग बनाया है...आशा है लिखूंगी...अच्छा लिखूंगी ....